Sunday, February 26, 2017

Kagaz aur Kalam ( Pen on Paper: a poem in Hindi)


अरसे बाद आज काग़ज़ पर कलम आ रही है ।
विषृाम लगाया है आज बड़े बरसों के बाद ।
मुद्दतें बीतीं हिंदी लिखे --
माताृऐं मुशकिल में डाल रही हैं ।
जानती हूं खिचड़ीनुमा है शब्दकोष मेरा,
पर  Pilot  की नोक पन्ने पर यूं इतरा रही है
अरसे बाद आज काग़ज़ पर कलम आ रही है ।

याद आ रहे हैं वो fountain pen,
वो Waterman की शीशी, Royal Blue वाली...
और वो ink eraser जो उन दिनों rubber कहलाया करता था...
दाग़ कम, पन्ना ज़्यादा मिटाया करता था
शायद कुछ आजकल की राजनीति की तरह !
पर  Pilot  की nib पन्ने पर यूं इतरा रही है
चूंकि अरसे बाद आज काग़ज़ पर कलम आ रही है ।

याद हैं तुम्हें वो ink spots?
और वो blotting paper के चौकौर टुकड़े?
कितनी आसानी से छोटे-बड़े दाग़ मिटा देते थे वो ...
हमारी नादान ग़लतियों का विष चुपचाप पी जाते थे वो ।
 Keyboards की इस दुनिया में,
कहां से लाइगा ऐसे नीलकण्ठी blotting paper?
जो दिलों में भभकती इस intolerance की स्याही फो भस्म कर दें ।
Us और them की दूरियों में उलझ कर हताश हो रही है Pilot की nib,
क्यूंकि अरसे बाद उठी ये कलम, काग़ज़ पर आने से घबरा रही है शायद॥




7 comments:

  1. Wonderful to read hindi poetry after ages.

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    1. Thank you so much Nikhil, it's an attempt:)

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  3. i don't have word to explain my feelings after reading your poem in hindi---Wowwww Thank you so much

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    1. You are welcome:) And thank you for reading and commenting, would love to know your identity.

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